पावरफुल और लग्जरी कार बनाने के लिए मशहूर ब्रिटिश ऑटोमोबाइल कंपनी रोल्स रॉयस ने अपनी ऑल टेरेन एसयूवी कलिनन को भारत में लॉन्च कर दिया है। भारत में इसकी एक्स शोरूम कीमत 6.95 करोड़ रुपए रखी गई है। इस कार ने मई 2018 में अपना ग्लोबल डेब्यू किया था जिसके बाद से ही यह अपने पावरफुल इंजन और लग्जरी फीचर्स को लेकर हमेशा सुर्खियों में रही।
इस कार को यूरोप, अमेरिका और UAE में टेस्ट किया गया जहां कि एनवायरनमेंट और ड्राइविंग कंडिशन अलग अलग होती है जिससे यह सुनिश्चित होता है कि यह हर तरह के कंडिशन में चल सकती है। इस कार का नाम 3106 कैरेट डायमंड कलिनन से इंस्पायर्ड होकर रखा गया है।
इस मोस्ट प्रीमियम पावरफुल एसयूवी में यह है खास बातें...
यह पावरफुल एसयूवी को रोल्य रॉयस फैंटम के एल्युमिनियन स्पेस फ्रेम पर डिजाइन किया गया है जो कंपनी की पहली एसयूवी है। इसके फ्रंट में कंपनी की मोस्ट पॉपुलर और आईकॉनिक ग्रिल दी गई है जो पूरी तरह से क्रोम से फिनिश्ड है।
इसके साथ ही इसमें रेक्टेंगुलर लेजर हेडलाइट दी गई है। डायमेंशन की बात करें तो कार की लंबाई 5341 mm, चौड़ाई 2146 mm और ऊंचाई 1835 mm है। इसमें 3295 mm का व्हीलबेस है वहीं यह 2660 kg वजनी है।
इसमें कंपनी के सिग्नेचर सूसाइड डोर्स दिए गए हैं जो कंपनी की लगभग हर कार में देखने को मिलते हैं। वहीं इसमें टेलगेट स्पॉइलर और ड्युअल एग्जॉस्ट सेटअप दिया गया है।
हर परिस्थिति में चलने के लिए इसमें 22 इंच के ड्युअल टोन अलॉय व्हील्स दिए गए हैं।
इसमें कस्टमर्स की डिमांड के अनुसार सीटिंग ऑप्शन दिया जाएगा लेकिन इसके टेलगेट में फोल्डेबल सीट विथ टेबल का ऑप्शन स्टैंडर्ड फीचर के तौर पर दिया गया है।
कंपनी ने इसमें हार्डक्लास लग्जरी फीचर्स से लैस किया है। इससे डैशबोर्ड में नया टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम लगाया गया है साथ ही रियर पैसेंजर्स के लिए इसमें 12 इंच का टचस्क्रीन मॉनिटर दिया गया है।
यह सिस्टम डिजिटल टी.वी., ब्लू रे डिस्क प्लेयर और 18 स्पीकर्स फीचर्स से लैस है।
कार में सुख सुविधा के तमाम लग्जरी फीचर्स दिए गए हैं जैसे इसमें मसाज देने वाली पावर सीट्स, कनेक्टिविटी और नेवीगेशन, नाइट विजन फंक्शन, पेडिस्ट्रियल और वाइल्डलाइफ अलर्ट, अलर्टनेस असिस्टेंस, पैनोरमिक व्यू के साथ 4 कैमरा, एक्टिव क्रूज कंट्रोल, वायफाय हॉटस्पॉट और हेडअप डिस्प्ले दिया गया है।
रोल्स रॉयस ने इस पावरफुल एसयूवी में 6.75 लीटर का V12 इंजन दिया है जो 563 bhp पावर और 850 Nm पीक टॉर्क जनरेट करता है।
इसमें दिया गया एयर सस्पेंशन सिस्टम, ऑल व्हील ड्राइव सिस्टम और अलग-अलग तरह के ड्राइव मोड्स इस ओवरसाइज एसयूवी को पथरीले, रेतीले और बर्फीले रास्तों पर कंफर्टेबली चलने में सक्षम बनाते हैं।
Tuesday, December 4, 2018
Monday, November 12, 2018
एमनेस्टी ने म्यांमार की नेता सू ची से वापस लिया सर्वोच्च सम्मान
इस पोस्ट को शेयर करें Facebook इस पोस्ट को शेयर करें Messenger इस पोस्ट को शेयर करें Twitter इस पोस्ट को शेयर करें ईमेल साझा कीजिए
इमेज कॉपीरइटEPA
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने म्यांमार की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची से अपना सर्वोच्च सम्मान 'एंबेसडर ऑफ़ कॉन्शियंस अवॉर्ड' वापस ले लिया है.
म्यांमार की सर्वोच्च नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता सू ची को साल 2009 में इस सम्मान से नवाज़ा गया था, ये वो वक़्त था जब सू ची अपने घर में नज़रबंद थीं.
मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के मामले में उनकी चुप्पी बेहद निराश करने वाली रही है.
ये पहला मौका नहीं है जब 73 वर्षीय सू ची से कोई सम्मान वापस लिया गया है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के सेक्रेटरी जनरल कुमी नाइडू ने म्यांमार की नेता को एक ख़त लिखकर इस संबंध में जानकारी दी.
आपको ये भी रोचक लगेगा
क्या शिवराज सिंह चौहान मुसलमानों के भी मामा हैं?
वो सैन्य अभ्यास जो दुनिया ख़त्म कर सकता था
'अयोध्या की वो राजकुमारी जो बनी कोरिया की महारानी'
ट्रंप और किम की मोहब्बत में क्या आ गई है दरार?
इसके मुताबिक़, "हम बेहद निराश हैं कि अब आप उम्मीद और साहस का प्रतीक नहीं दिखतीं. न आप मानवाधिकारों की रक्षा में अडिग नज़र आती हैं. "
इमेज कॉपीरइटREUTERS
"रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हुए अत्याचारों के प्रति उनके रुख़ को देखते हुए इस बात की बेहद कम उम्मीद है कि स्थिति में कुछ सुधार होगा."
एक समय में इसी संस्था ने उन्हें लोकतंत्र के लिए प्रकाशस्तंभ बताया था. सू ची को नज़बंदी से रिहा हुए आठ साल हो गए हैं और ये फ़ैसला उनकी रिहाई के आठ साल पूरे होने के दिन ही आया है.
एक क्रूर सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ और लोकतंत्र की रक्षा के लिए 15 साल तक नज़रबंद रहने वाली सू ची को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 1989 में "राजनैतिक बंदी" घोषित किया था. इसके ठीक 20 साल बाद संस्था ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा. इससे पहले नेल्सन मंडेला को ये सम्मान दिया गया था.
इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
अब, संस्था का कहना है कि वो अपना दिया हुआ सम्मान वापस ले रहे हैं क्योंकि उन्हें नहीं लगता है कि वो इस सम्मान के लिए आवश्यक योग्यता के साथ न्याय कर पा रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष में कहा कि सैनिकों द्वारा रोहिंग्या अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ वो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने में नाकाम रही हैं.
सू ची साल 2016 में सत्ता में आईं. हालांकि उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव हमेशा रहा. जिसमें से एक दबाव एमनेस्टी इंटरनेशनल की तरफ़ से भी था कि रोहिंग्या अल्पसंख्यकों पर सेना के अत्याचार का उन्हें विरोध करना चाहिए, लेकिन सू ची ने इस मामले में चुप्पी ही साधे रखी.
क्या नोबेल वापस करेंगी आंग सान सू ची?
साथ ही रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या की पड़ताल करने वाले रॉयटर न्यूज़ एजेंसी के दो पत्रकारों की गिरफ़्तारी का समर्थन करने के लिए भी उनकी काफी आलोचना हुई थी.
ये भी पढ़ें...
रख़ाइन दौरे पर क्या बोलीं आंग सान सू ची?
आंग सान सू ची सत्ता में आते ही भूल गईं क्रांति!
रोहिंग्या मुसलमानों पर सू ची से मलाला के सवाल
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो सकते हैं.)
बीबीसी न्यूज़ मेकर्स
चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
इमेज कॉपीरइटEPA
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने म्यांमार की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची से अपना सर्वोच्च सम्मान 'एंबेसडर ऑफ़ कॉन्शियंस अवॉर्ड' वापस ले लिया है.
म्यांमार की सर्वोच्च नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता सू ची को साल 2009 में इस सम्मान से नवाज़ा गया था, ये वो वक़्त था जब सू ची अपने घर में नज़रबंद थीं.
मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के मामले में उनकी चुप्पी बेहद निराश करने वाली रही है.
ये पहला मौका नहीं है जब 73 वर्षीय सू ची से कोई सम्मान वापस लिया गया है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के सेक्रेटरी जनरल कुमी नाइडू ने म्यांमार की नेता को एक ख़त लिखकर इस संबंध में जानकारी दी.
आपको ये भी रोचक लगेगा
क्या शिवराज सिंह चौहान मुसलमानों के भी मामा हैं?
वो सैन्य अभ्यास जो दुनिया ख़त्म कर सकता था
'अयोध्या की वो राजकुमारी जो बनी कोरिया की महारानी'
ट्रंप और किम की मोहब्बत में क्या आ गई है दरार?
इसके मुताबिक़, "हम बेहद निराश हैं कि अब आप उम्मीद और साहस का प्रतीक नहीं दिखतीं. न आप मानवाधिकारों की रक्षा में अडिग नज़र आती हैं. "
इमेज कॉपीरइटREUTERS
"रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हुए अत्याचारों के प्रति उनके रुख़ को देखते हुए इस बात की बेहद कम उम्मीद है कि स्थिति में कुछ सुधार होगा."
एक समय में इसी संस्था ने उन्हें लोकतंत्र के लिए प्रकाशस्तंभ बताया था. सू ची को नज़बंदी से रिहा हुए आठ साल हो गए हैं और ये फ़ैसला उनकी रिहाई के आठ साल पूरे होने के दिन ही आया है.
एक क्रूर सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ और लोकतंत्र की रक्षा के लिए 15 साल तक नज़रबंद रहने वाली सू ची को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 1989 में "राजनैतिक बंदी" घोषित किया था. इसके ठीक 20 साल बाद संस्था ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा. इससे पहले नेल्सन मंडेला को ये सम्मान दिया गया था.
इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
अब, संस्था का कहना है कि वो अपना दिया हुआ सम्मान वापस ले रहे हैं क्योंकि उन्हें नहीं लगता है कि वो इस सम्मान के लिए आवश्यक योग्यता के साथ न्याय कर पा रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष में कहा कि सैनिकों द्वारा रोहिंग्या अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ वो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने में नाकाम रही हैं.
सू ची साल 2016 में सत्ता में आईं. हालांकि उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव हमेशा रहा. जिसमें से एक दबाव एमनेस्टी इंटरनेशनल की तरफ़ से भी था कि रोहिंग्या अल्पसंख्यकों पर सेना के अत्याचार का उन्हें विरोध करना चाहिए, लेकिन सू ची ने इस मामले में चुप्पी ही साधे रखी.
क्या नोबेल वापस करेंगी आंग सान सू ची?
साथ ही रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या की पड़ताल करने वाले रॉयटर न्यूज़ एजेंसी के दो पत्रकारों की गिरफ़्तारी का समर्थन करने के लिए भी उनकी काफी आलोचना हुई थी.
ये भी पढ़ें...
रख़ाइन दौरे पर क्या बोलीं आंग सान सू ची?
आंग सान सू ची सत्ता में आते ही भूल गईं क्रांति!
रोहिंग्या मुसलमानों पर सू ची से मलाला के सवाल
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो सकते हैं.)
बीबीसी न्यूज़ मेकर्स
चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
Subscribe to:
Posts (Atom)